Blog

क्या हमारी दुनिया बदल रही है ? – 1

“शोक कैसा होता है, आप जानती हैं ?”, मृतका की माँ ने जज से पूछा | जज ने कुछ नहीं कहा | “आप लोग ट्रेन्ड लोग, ज़्यादा पढ़े लिखे लोग, सब समझने वाले लोग | आपको लगता है आप समझते हैं | ख़ैर ग़लतफ़हमी का क्या है, किसी को भी हो जाती है | अच्छीContinue reading “क्या हमारी दुनिया बदल रही है ? – 1”

Understanding Compatibility

 What do I mean by Compatibility? At the onset, allow me to make it very clear, that the whole response below is neither meant as a sacrosanct model that works for everyone, nor does it indicate that this is some sort of a checklist. While I have tried to present it cohesively and coherently, that’sContinue reading “Understanding Compatibility”

मुझे नींद नहीं आती

मुझे नींद नहीं आती शुक्राना है, कि मैं माँ नहीं, मैं पिता नहीं शुक्राना कि Margaret Atwood के Handmaid’s tale में शायद मैं unwoman होती | नहीं चाहिए मुझे वो बच्चियाँ जो सामान भर हैं,सदियों से, दान के लिए, भोग के लिए, अत्याचार के लिए भी | मुझे नींद नहीं आती कि नहीं चाहिए मुझेContinue reading “मुझे नींद नहीं आती”

Where the mind is caged, the body can’t be free!

  “कितनीगिरहें खोली हैं मैंने, कितनी गिरहें अब बाकी हैं…” चित्रासिंह की आवाज़, गुलज़ारके बोल, और मेरेगंजे सिर को बेखयालीमें सहलाता मेरा हाथ | मैंनेधीमे से मुस्कुरा करशीशे में झाँका | एकजोड़ी आँखें पलट कर मुस्कुराईंऔर कहने लगीं, “यादहै, तुमने एक बार कुमारमुकुल का एक फेसबुक कमेंट पढ़ा था– सुनयना चूड़ियाँपहनती है और मैंसोच! जबContinue reading “Where the mind is caged, the body can’t be free!”

चूड़ियाँ और सोच

9/8/2014 मुकुलने लिखा, ‘सुनयनाचूडियाँ पहनती है, और मैं सोच।’’ मगर, क्याचूड़ियाँ और सोच, नैसर्गिकरूप से, निश्चित ही, एक दूसरे के विपरीत बोधहै ? क्याही ज़रूरी है, कि मैं जो सोचपहनूँ, तो चूडियाँ छोड़ ही दूँ?   मेरेघर में, चूड़ियाँऔर सोच, साथपहनी जा सकती हैं, साथपहनी जाती हैं इसीलिएमैं, चूड़ियाँपहनती हूँ, और साथ ही ……………सोच भी।Continue reading “चूड़ियाँ और सोच”

मैं स्त्री हूँ

तुम कहते हो, मैं तुम्हें समझ नहीं आती | क्या करूँ, मैं खुद को ही समझ नहीं आती | अपना होना छटपटाहट पैदा करने लगे तो क्या करूँ? पहले इस छटपटाहट से लड़ती थी |  फिर इसको दबाने की, इसका दम घोंटने की कोशिश की, फिर इसे नज़रअंदाज़ किया, फिर इसे स्वीकार करने लगी, अबContinue reading “मैं स्त्री हूँ”

पिता, तुम !

अपने भरे बालों वाले सर से तुमने कई बच्चों का माथा छुआया है अपनी दाढ़ी से तुमने, क्या बच्चों का चेहरा गुदगुदाया है दाढ़ी खींचते, चश्मा छूते बच्चों को तुमने किलक कर बाँहों में भरा है तुम्हारा स्नेह सान्निध्य का आकाश है, प्रेम की धरा है | पिता तुम ही हो, जो मुझे मिले शिक्षकContinue reading “पिता, तुम !”

प्रेम और प्रतीक्षा – 2

भंते! क्या तुम्हारा और मेरा संघ में होना, एक जैसा है ?क्या साधु और साध्वियाँ वाकई देख पाते हैं, आत्म का स्वरूप, देह के पार ?आँखों में, विचलित हुए बिना ? यदि नहीं, तो क्यों न सब संघों, सब मठों को विघटित कर दिया जाये?क्यों न उन सब प्रतिमानों को ध्वस्त कर दिया जाये, जोContinue reading “प्रेम और प्रतीक्षा – 2”

Loading…

Something went wrong. Please refresh the page and/or try again.


Follow My Blog

Get new content delivered directly to your inbox.

%d bloggers like this: