क्या हमारी दुनिया बदल रही है ? – 1

“शोक कैसा होता है, आप जानती हैं ?”, मृतका की माँ ने जज से पूछा |

जज ने कुछ नहीं कहा |

“आप लोग ट्रेन्ड लोग, ज़्यादा पढ़े लिखे लोग, सब समझने वाले लोग | आपको लगता है आप समझते हैं | ख़ैर ग़लतफ़हमी का क्या है, किसी को भी हो जाती है | अच्छी से अच्छी ट्रेनिंग के बावजूद भी |”
“शोक होता है, बेबी पाउडर की बची खुची धुंधलाती गंध जैसा”, उन्होंने कहा |

“सूखे होठों जैसा, अपनी घबराई माँ के आँचल में सर छुपा के पड़े रहने जैसा, आंसू सूख जाने जैसा, अपनी 13 साल की बच्ची की लाश को गोद में उठाने, लेकिन उसके मुंह की ओर देख भी न पाने जैसा, क्योंकि आपने अपनी बच्ची के लिए अच्छी ज़िन्दगी का सपना देखा था | और आपको बदले में मिली, अपनी बच्ची का रेप, और उसकी हत्या | वो भी कुछ 19-साला लड़कों से ???”

“इनकी तरफ देखिये Your Honor ! मैं क्या करूँ? बोलूँ इन्हें फाँसी दीजिये? इनकी माँओं को मैं वो सज़ा कैसे दूँ, जो इन्होंने मुझे बिना कुछ किये दे दी? आप सज़ा देना चाहते हैं? दीजिये इन्हें सजा कि अगले पाँच साल में, 25 – 25 रेप विक्टिम्स की ज़िंदगियाँ पटरी पर लाएंगे !”

“इनके गुनाह, हम सब माँओं के दुःख, और आपकी सज़ा में आपस में कोई सम्बन्ध नहीं है Your Honor | लेकिन, अगर सज़ा से हम औरतों की दुनिया थोड़ी बदलती हो तो ज़रूर | बाकी न्याय की किताबें आप लोगों ने पढ़ी हैं | जो संविधान कहे वो कीजिये | ”

आज सालों बाद भी, वो 13 साल की बच्ची हज़ारों हज़ारों लड़कियों में रोज़ मर रही है | लेकिन क्या हमारी दुनिया बदल रही है ? 
 

 
 
©  Anupama Garg 2020

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