Where the mind is caged, the body can’t be free!

 

“कितनीगिरहें खोली हैं मैंने, कितनी गिरहें अब बाकी हैं…”

चित्रासिंह की आवाज़, गुलज़ारके बोल, और मेरेगंजे सिर को बेखयालीमें सहलाता मेरा हाथ | मैंनेधीमे से मुस्कुरा करशीशे में झाँका | एकजोड़ी आँखें पलट कर मुस्कुराईंऔर कहने लगीं, “यादहै, तुमने एक बार कुमारमुकुल का एक फेसबुक कमेंट पढ़ा थासुनयना चूड़ियाँपहनती है और मैंसोच! जब तुमने येपढ़ा तो पलट केक्या लिखा था?”

 

 

 

मुझेयाद आया मैंने क्यालिखा था |

मुकुल ने किसी को क्वोट किया ,

सुनयनाचूडियाँ पहनती है,

और मैं सोच।’’

मगर,

क्याचूड़ियाँ और सोच,

नैसर्गिकरूप से, निश्चित ही,

एक दूसरे के विपरीत बोधहै ?

क्याही ज़रूरी है,

कि मैं जो सोचपहनूँ,

तो चूडियाँ छोड़ ही दूँ?

मेरेघर में,

चूड़ियाँऔर सोच,

साथपहनी जा सकती हैं,

साथपहनी जाती हैं

इसीलिएमैं,

चूड़ियाँपहनती हूँ,

और साथ ही ……………सोच भी।

मगरजब मैंने ये लिखा थातो ३० पार कियाही था मैंने | कर्ज़चुकता नहीं हुए थे| बेहतर नौकरी, बाहर पढ़ पानेकी उम्मीदें, लम्बा वक़्त घर बितापाने की आशाएँ, औरउम्रदराज़ माँबाप की सेहत, और ज़िन्दगी की मुट्ठी सेफिसलता वक़्त दिमाग परहावी नहीं था | दिमागआज़ादख्याल तो तब भीथा, लेकिन आत्मा की स्वतंत्रता नेमेरे साथ बाहरभीतरसे लपक कर मनकी बेड़ियाँ तोड़ने की साज़िशें नहींरचाईं थीं |

प्रेमऔर साथ के बीचका फर्क, ईमानदारी, वफ़ादारी, झूठ, परिवार, शादी, करियर, आत्मपीड़न, आत्मवंचना, आत्महनन और ऐसे पचासहज़ार विचारों से भी वाक़फ़ियतनहीं थी तब | अबलगता है, उस सबकी ज़रुरत ही नहीं होती, यदि सिर्फ तीन शब्द समझआते हों. जीने आतेहोंईमानदारी, स्वतंत्रता, और करुणा | ऐसानहीं किफिर दुःखसमाप्त हो जाता है, या कि उदासी सतातीनहीं | ऐसा नहीं किमौन से वैचारिक मुखरतासमाप्त हो जाती है| लेकिन, फिर इस बातकी चिंता नहीं रहती किघर के बाहर एकगाडी खड़ी है, याऑटो स्टैंड का ऑटो | कमसे कम स्वयं कीमृत्यु के भय सेमुक्ति मिल जाती है| कम से कम परिवारबनाने का आंतरिक दबावइस बात से नहींहोता कि वृद्धावस्था कैसेकटेगी |

शरीरवो कर पाता है, जो उसके लिए स्वास्थ्यवर्धकहै | मन वो करपाता है जो बीतेकल की ग्लानि, याआने वाले कल कीचिंता से ग्रस्त हो | आपके चुनाव हीनहीं, आपके चुनावों केकारण, और उनके परिणामभी बदल जाते हैं|

चाहेवो चुनाव विवाह का हो, आस्थाका, यायावरी का, परिवार का, एकाकीपन का, या मुण्डनका | जब मन स्वतंत्रहो तो इंतज़ार नहींकरना पड़ता किसी कीसार सँभार करने के लिए, उसके लिए साथ कुछबुरा होने का | जबमन स्वतंत्र हो, तो शर्मनहीं होती बेवजह की, किसी को ये कहनेमें, कितुमसे आकर्षित हूँ, लेकिन औरोंसे भी हूँ” | जबमन स्वतंत्र हो तो आपसमझ पाते हैं, किआपका शरीर, आपका बुढ़ापा, आपकाअकेलापन, आपका परिवार, आपकासामाजिक सामंजस्य आपकी अपनी ज़िम्मेदारीहै | और ये भीसमझ पाते हैं किआपकी ज़िम्मेदारी सिर्फ अपनी स्वतंत्रता हीनहीं, दूसरों की स्वतंत्रता कासंरक्षण भी है |

इस स्वतंत्रता के लिए जोकरना पड़े, कर लो, ऐसा मुझे लगता है| फिर, जब दौड़ना होतब डर नहीं लगता, जब अफेयर करना हो तबभी नहीं, जब ब्रेकअप करनाहो तब भी नहीं| फिर डर नहीं लगता, जब चूड़ियाँ पहननी हों, जब सोचपहननी हो, जब लम्बीचोटी में वेणी गूँथलेनी हो, या जबमुण्डन करवा के बैरागनका मन लिए संसारके बीच रहना होतब भी नहीं |


 

सर पर हाथ फेरतेफेरते, विचारों का तारतम्य एकाएकटूट गया जब मेरेसहयात्रियों ने दरवाज़ा खटखटायाऔर कहा, “चलो गंगा घाटपर नाव में, समयहो गया” | मणिकर्णिका घाट पर देहकी मुक्ति देखते हुए, इस बारडर नहीं लगा | क्योंकिजब मन स्वतंत्र होतो देह का बंधनभी नहीं रह जाता| 

 © Anupama Garg 2020

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