मैं स्त्री हूँ

तुम कहते हो, मैं तुम्हें समझ नहीं आती | क्या करूँ, मैं खुद को ही समझ नहीं आती | अपना होना छटपटाहट पैदा करने लगे तो क्या करूँ? पहले इस छटपटाहट से लड़ती थी |  फिर इसको दबाने की, इसका दम घोंटने की कोशिश की, फिर इसे नज़रअंदाज़ किया, फिर इसे स्वीकार करने लगी, अब आदत पड़ गयी है | जैसे जैसे इसके साथ जीती जाती हूँ, वैसे वैसे एक एक पल जीवंत होता जाता है |

ये छटपटाहट घुटन नहीं है, घबराहट नहीं है | ये वैसे है, जैसे लार्वा / प्यूपा से तितली का बनना | ये वैसे है जैसे अंकुर का धरती का सीना फोड़ के निकलना | जब ये छटपटाहट चोट पहुंचाती है, तो जापानी kintsugi जैसी हो  जाती है | ये जब बहुत लम्बी शाम में बदल जाती है, तो मैं वैसी ही हो जाती हूँ जैसे  12 साल बाद अचानक आसमान छूने वाला chinese bamboo जो सालों अपनी जड़ें गहरी कर रहा होता है |

इस छटपटाहट में कुछ लोग सींचते भी हैं, कुछ कुचल भी देते हैं, जाने अनजाने | कभी कभी कोई कुत्ता आ के मूत भी देता है क्योंकि मैं एक उम्र के बाद पाली-पोसी फसल का खेत नहीं, एक बेतरतीब जंगल हो गयी | लताएं, बेलें, पेड़, पौधे, झाड़-झंखाड़ सब कुछ हूँ मैं | हाथी भी आते हैं कुचलने कभी कभी | सिंह शिकार भी करता है मुझमें, ज़हरीली सर्पिणियाँ अपने बच्चे भी सेती हैं, कोयल कूकती भी है| और मेरे बीचों बीच बने पोखर में, एक मत्स्यकन्या, कभी कभी मनुष्यों से मिलने की इच्छा भी करती है | भूले भटके कोई महात्मा, और कभी कभी कोई प्रेमी युगल भी आ निकलता है, और घायल गैया भी इक्की दुक्की |

जब समूची सृष्टि समेट रखी है मैंने, तो कहो तुम ही, ये छटपटाहट कैसे न हो? जंगल का काम है, बेतरतीब बढ़ते जाना | नदी का काम है निर्बाध बहते जाना | लेकिन समस्या ये है, कि तुम मुझसे आज़ादी जंगल की, निर्झर नदियों की चाहते हो, लेकिन मुझे बांधना वैसे चाहते हो जैसे फसल बोया खेत, जैसे तुम्हारे गाँव की तलैया | सुनो, मैं देव प्रयाग की गंगा हूँ, हरहराती, निर्द्वन्द | तुम मुझे अपने शहर का नाला क्यों बनाना चाहते हो?

मैं वो छटपटाहट हूँ, जो तुम्हें नहीं दिखती, नहीं दिख सकती | मैं पृथ्वी के भीतर उबलता लावा हूँ | मैं हर फूटता ज्वालामुखी हूँ | मैं हर दरकती शिला हूँ | मैं हर धसकती रेत का टीला हूँ | मैं हर वो औरत हूँ, जिसको युद्द के बाद विजेता सेना ने बलात्कृत किया | लेकिन मैं हर वो औरत भी हूँ, जिसने जौहर कर लिया, जिसने युद्ध में लड़ कर, कर कर जान दे दी | मैं वो औरत भी हूँ जो खेत में धन रोपती, काटती, फसल उगाती है | और वो भी जो जंगल से जलावन बीन लाती है |

मैं इस समूची सृष्टि की थरथराहट हूँ | मैं जीवन की सुगबुगाहट हूँ | मैं अकेलेपन की छटपटाहट हूँ | मैं बीमारी की कंपकपाहट हूँ | मैं मृत्यु की आहट हूँ | मैं स्त्री हूँ | तुम मुझे कैसे समझोगे?

मुझे समझने के लिए तुम्हें मिलना होगा मुझसे – पूर्वाग्रहों से भरी इस दुनिया के उस पार, विमर्श की घाटी में, और बसाना होगा सिरे से मेरे साथ, नया संसार | कर सकोगे? करोगे? बोलो?

© Anupama Garg 2020

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