पिता, तुम !

अपने भरे बालों वाले सर से
तुमने कई बच्चों का माथा छुआया है
अपनी दाढ़ी से तुमने, क्या बच्चों का चेहरा गुदगुदाया है
दाढ़ी खींचते, चश्मा छूते बच्चों को तुमने किलक कर बाँहों में भरा है
तुम्हारा स्नेह सान्निध्य का आकाश है, प्रेम की धरा है |

पिता तुम ही हो, जो मुझे मिले शिक्षक की तरह
पिता तुम ही हो, जो मुझे मिले रक्षक की तरह
अरसे तक ढाल भी तुम ही थे, और  तलवार भी तुम
आसान था ये कहना कि तुमसे कह दूँगी, और ये मानना कि सब ठीक हो जायेगा
और आज, जब मेरी अपनी अलग सोच है, अलग विचार भी
उतना ही आसान है ये कहना भी कि कुछ भी कर दूँगी, तुम साथ रहोगे, सब ठीक हो जायेगा

पिता तुम ही दीखते हो भाई में भी, वो छोटे हैं, तब भी,
तुम्हारी तरंगित, किलकिलाती, शरारती आँखें, जीवंत होती हैं, उनके नक्श नयन में
तुम ही हो पिता, जो कहीं कहीं, हमेशा से झलकते हो,
हम सब की करनी में, हम सब के कहन में 

पिता तुम ही हो, जिसे ढूँढा और पाया मैंने पुरुष मित्रों में
वे तुम नहीं, लेकिन कुछ कुछ तुमसे हैं
विनम्र, मृदुभाषी, पलट के बहस करने वाले भी
हार कर पूरा विमर्श छोड़ने वाले, और
एक इंच ज़मीन विवाद में न देने वाले भी

तुम ही हो, हर दोस्त में, जो कठिनाई में, अँकवार भर साहस फिर से जगाता है
तुम हो, हर उस पुरुष में, जो घने अवसाद के बीच, मन में, जीवन को आलोकित करने की लौ जलाता है
तुम ही हो हर शिक्षक, हर अधिकारी, हर मातहत में भी
तुम ही हो, जो हर जगह कड़े फैसले, नरम दिल और भाषा के साथ दिलाता है

तुम ही हो, जिसके भीतर का पुरुष, मेरे भीतर की स्त्री के साथ
मेरे ही भीतर सहज, स्वाभाविक सहजीवी रूप में रहता है
पिता तुम ही हो, जिसका स्नेह, निश्छल, निर्झर, अग्नि-स्वरुप,
ऊष्म मेरे भीतर, माँ के ममत्त्व के साथ ऊष्ण बहता है

तुम हो पिता जिसकी खोज रहती है, विलग व्यक्तित्त्व के पार भी
वो कैसा पुरुष होगा, जो कर सकेगा मुझे, तुम जैसा स्वीकार भी?
जो सह सकेगा तेज मेरे भीतर की स्त्री का, मेरा मुंडा हुआ सर, और मेरे सारे विचार भी?
वो तुम जैसा होगा पिता,
जो मेरे साथ सजा, सींच सकेगा, सिर्फ अपना घर नहीं, पूरा संसार भी |

और जो न भी हो पाए वो तुम्हारे जैसा, तो कोई हानि नहीं |
क्योंकि कहीं उसके पिता भी होंगे,
और कभी वो भी होगा पिता
समय शायद लगेगा उसे
लेकिन एक दिन, कभी तो
जब पितृ तत्त्व का संधान कर लेगा वो
तो उसमें झलक उठोगे फिर से
पिता, तुम!

© Anupama Garg 2020

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