प्रेम और प्रतीक्षा – 2

भंते! क्या तुम्हारा और मेरा संघ में होना, एक जैसा है ?क्या साधु और साध्वियाँ वाकई देख पाते हैं, आत्म का स्वरूप, देह के पार ?आँखों में, विचलित हुए बिना ? यदि नहीं, तो क्यों न सब संघों, सब मठों को विघटित कर दिया जाये?क्यों न उन सब प्रतिमानों को ध्वस्त कर दिया जाये, जोContinue reading “प्रेम और प्रतीक्षा – 2”

प्रेम और प्रतीक्षा – 1

वो मिला मुझे,ले कर ज्ञान का अथाह भण्डारमैं प्रेम की तलाश में भटक रही थीहमने विमर्श किया और चल दिए, अलग अलग रास्तों परसमय की अथाह नदी के पार वो मिला मुझसे,लेकर हिंसा, अत्याचारमैं क्षमा की याचिका थीहमने रक्त बहाया और चल दिए, अलग अलग रास्तों परसमय की अथाह नदी के पार वो मिला मुझसे,लेकरContinue reading “प्रेम और प्रतीक्षा – 1”

बिलेटेड हैप्पी मदर्स डे मुझे भी !

बिलेटेड हैप्पी मदर्स डे मुझे भी ! मैं स्त्री विमर्श से कतराती क्यों हूँ? कई कारण हैं : 1. मैं इंटेरसेक्शनल फेमिनिज़्म को अभी पूरी तरह से समझती नहीं | इसलिए मैं पढ़ती ज़्यादा हूँ और मुंह खोल के भक से बकती कम |2. मेरे आस पास, यहाँ फेसबुक पे, ऑफलाइन, घर पे, ऑफिस में,Continue reading “बिलेटेड हैप्पी मदर्स डे मुझे भी !”